October 26, 2021

Shri Mahalakshmi Vrat, Worship and Method, Story of Deepawali.

महालक्ष्मी

On the day of the best festival of Deepawali, husband wife and other human beings should. That he should keep his thoughts pure, keep joy in the heart, do not let any kind of trouble come in the mind. In this way, wake up in the morning with a happy mind and bow down to your elders and get blessings. After taking bath and retiring from routine work, worship your favorite deities. After that, take food and water, if possible, then do fasting or fasting of Shri Mahalakshmi ji on this day. If you can’t fast, then eat fruit.
Decorate your house well by sweeping it from all sides and tie it with a bow. Worship Lakshmi ji wherever you are with beautiful and colorful clothes. Build a pavilion Make a beautiful altar in the middle of the pavilion. Make Ashtadal lotus on the altar with unsweetened kumkum etc. Install the statue of Shri Laxmiji on top of it by furnishing it with beautiful clothes made of silver or flying. If there is no idol of gold or silver, then install it of clay and put a beautiful elephant next to them and then around the house, first of all during the night, invoke Shri Lakshmi ji with divine garlands. Above the circles on the roof, on the balcony or on the windows, on the doorway, in the street, in the temple, at the crossroads, well, river, Donate lamps at ponds etc. Again where Shri Lakshmiji is seated. Light a pure lamp there and light scented incense sticks. After that worship aarti of Shri Mahalakshmi ji with love and devotion. Offer prasad to Lakshmi ji from different types of dishes and fruits etc., where there is a place to keep money, jewels, etc. Make offerings. After this, stand and do aarti of Shri Lakshmi ji with camphor. Praise the bell gharial in the midst of loud words. According to the reverence, the Prasad sweets of Shri Mahalakshmi ji should also be distributed among the people present. Every business and shopkeepers should keep their books of accounts, writings, pens, Worship medicine etc. Here it should be kept in mind that worship of Maa Kali should be done with the help of Christ pot and Shri Mahalakshmi ji should be worshiped where there is money. And in the same way, worship the scales, etc. Maa Saraswati is worshiped with a pen. And Kuber is worshiped with grains. In some places in our country, gambling is also played according to tradition, for this, along with the worship material, there is gambling. Keep this code in advance. After worship, people gamble with their relatives and other people with codices in those plants. They consider the result of winning and winning gambling as an indicator of the loss and profit of the year. But the half-playing done by worshiping Shri Lakshmi is a sign of the dance of the entire wealth. Bhagwati Lakshmi is not so pleased with gambling. As much as it is from the wealth created by effort and good path. And to such a man she blesses her pleasure. curse the gambler gives. and says. That idiot! You will be poor throughout your birth. Look, in gambling itself, the Pandavas were made beggars from rate to rate. The godly king put Nal in great troubles. Therefore, a sensible person should never allow such bad deeds to come near him because it is a mother’s curse, it is a great sin, it is a destroyer of effort and self-respect.
story of diwali

महालक्ष्मी


एक समय मुनियों ने संतकुमार जी से पूछा –हे महात्मन ! अब आप हमें लक्ष्मी पूजन का कारण बताइए तथा साथ में अन्य देवताओं की पूजा जाने का विवरण बताइए मुनियों की यह बात सुनकर श्री संत कुमार बोले – हे मुनियों ! आप लोगों ने जो प्रसन्न किया है। उसे ध्यानपूर्वक सुनो यही पसंद धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा तब भगवान ने कहा – है धर्मराज सुनो ! दैत्यराज बलि के राज्य में सारी प्रजा सुखी थी। किसी को कोई कष्ट नहीं था। सब लोग नियमानुसार रहते थे। यज्ञ आदि कर्म करते थे। एक बार बलि ने 100 अश्वमेध यज्ञ करने की प्रतिज्ञा की। अतः उसने 11 अश्वमेध यज्ञ कर लिए जब सौवा यज्ञ करने कि उसने तैयारी की तो इंद्र प्रभावित हुआ। और सोचने लगा अगर इसने सौवा यज्ञ पूर्ण कर लिया तो यह कहीं मेरा सिंहासन न छीन ले। अतः वह भय से कापता हुआ। ब्रह्मा, रुद्रा आदि देवताओं के साथ भगवान विष्णु के पास पहुंचा। वहां सब देवता अनेक पुरुष और भक्त आदि मंत्रों से भगवान की स्तुति करने लगे। तब भगवान प्रकट होकर बोले – हे इंद्रादिक देवताओं ! आप लोग इतने दुखी क्यों है? तब देवराज इंद्र ने बलि के यज्ञ का सारा हाल कह सुनाया। यह सुन भगवान बोले –हे इंद्र ! तुम सब देवता अपने अपने घर को जाओ मैं तुम्हारे भय को खत्म कर दूंगा।तब भगवान पुन: वामन अवतार धारण कर राजा बलि के पास गए। जहां वह अंतिम यज्ञ कर रहा था। बलि के सत्कार किए जाने पर भगवान ने तीन पग पृथ्वी का दान मांगा। बलि ने दान संकल्प कर दिया। भगवान ने एक पग में सारी पृथ्वी तथा दूसरे में अंतरिक्ष नाप लिया। और तीसरा उसके सिर पर रखा। फिर भगवान ने बलि से वर ने को कहा। बलि ने कहा – हे भगवान ! कार्तिक कृष्ण पक्ष (कार्तिक वदी) की त्रयोदशी चतुर्दशी और अमावस्या के दिन पृथ्वी पर मेरा राज्य रहें। संपूर्ण प्रजा खूब दीपदान आदि कर श्री लक्ष्मीजी का आवाहन पूजन करे। और लक्ष्मीजी उनके घर सदैव विराजमान रहे और जो श्रद्धा अनुसार पूजन ना करें। उनपर लक्ष्मीजी कुपित हो दरिद्र होने का शाप दें। इस प्रकार भगवान ने सब देवताओं को भय से मुक्त कर अभयदान दिया इसी कारण श्री लक्ष्मीजी के साथ साथ सब देवताओं की भी पूजा की जाती है।
भगवान बोले – हे राजन ! मैं तुमको एक कथा और सुनाता हूं। ध्यानपूर्वक सुनो मणिपुर नाम के एक नगर में एक राजा राज्य करता था। उसकी स्थिति बहुत ही सुंदर, सुशील, सर्वगुण, संपन्न एवं पतिवर्ता थी। एक दिन वह अपनी प्यारी सखियों के साथ महल की छत पर बैठी हुई हास्य विलास कर रही थी। उसने मनी माणिक्य आदि से जड़ा हुआ नौलखा हार उतारकर समीप ही मुंडेर पर रख दिया । शीघ्र ही एक चील उस हार को अपनी चोंच में दबाकर उड़ गई। रानी यह देखकर बहुत ही उदास हुई। और सारा हाल राजा से कह सुनाया राजा चील पर बड़ा कुपित हुआ। पर करता क्या रानी को समझाते हुए बोला – प्रिये ! मैं तुम्हारा हार जहां पर भी चील डालेगी वहां से मंगवा दूंगा। चिंता ना करो यह कहकर राज्यसभा में गया और मुनादी वालों को बुलाकर कहा तुम लोग मेरे राज्य में मुनादी फेर कर कहो कि जो कोई रानी का नौलखा हार लाकर देगा। राजा उसको मुंह मांगा इनाम देगा।

महालक्ष्मी


यह सुन एक बुढ़िया राजा के पास पहुंची है। और वह हार दे दिया। राजा बड़ा प्रसन्न हुआ और इनाम मांगने को कहा। बुढ़िया ने कहा – राजन ! आज से आठवें रोज दीपावली है। मां लक्ष्मीजी का पूजन है। अतः राज्य में कोई भी आदमी दीपावली न मनावे। सिर्फ मैं ही दीपावली मनाऊंगी। और लक्ष्मी जी का पूजन करूंगी। इसलिए तेल बत्ती दीपक आदि सब सामग्री आप मेरे यहां भिजवा दें। यह सुन राजा आश्चर्यचकित हो बोला ऐसा करने से तुझे क्या लाभ होगा। बुढ़िया बोली आज के दिन व्रत एवं लक्ष्मी पूजन से तथा दीपदान करने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती है। और उसके घर सदैव निवास करती है। राजा ने कहा मैं भी करूंगा। बुढ़िया बोली पहले मैं करूंगी। बाद में तुम करना ऐसा करने पर राजा और बुढ़िया के घर अतुल संपत्ति धन दौलत हाथी घोड़े आदि हो गये। अतः हे धर्मराज ! यह दीपावली का व्रत पूजन तुम भी करो जिससे खोई हुई राज्य–श्री तथा पुत्र–पौत्र आदि तुमको पुनः प्राप्त हो।